श्री प्रेतराज चालीसा - चालीसा संग्रह

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Sunday, October 24, 2021

श्री प्रेतराज चालीसा

॥श्री प्रेतराज चालीसा॥

॥ दोहा ॥

गणपति की कर वंदना, गुरु चरनन चितलाय ।
प्रेतराज जी का लिखूं, चालीसा हरषाय ॥
जय जय भूताधिप प्रबल, हरण सकल दु:ख भार ।
वीर शिरोमणि जयति, जय प्रेतराज सरकार ॥ 

॥ चौपाई ॥

जय जय प्रेतराज जग पावन । महा प्रबल त्रय ताप नसावन ॥
विकट वीर करुणा के सागर । भक्त कष्ट हर सब गुण आगर ॥
रत्न जटित सिंहासन सोहे । देखत सुन नर मुनि मन मोहे ॥
जगमग सिर पर मुकुट सुहावन । कानन कुण्डल अति मन भावन ॥

धनुष कृपाण बाण अरु भाला । वीरवेश अति भृकुटि कराला ॥
गजारुढ़ संग सेना भारी । बाजत ढोल मृदंग जुझारी ॥
छत्र चंवर पंखा सिर डोले । भक्त बृन्द मिलि जय जय बोले ॥
भक्त शिरोमणि वीर प्रचण्डा । दुष्ट दलन शोभित भुजदण्डा ॥

चलत सैन काँपत भूतलहू । दर्शन करत मिटत कलि मलहू ॥
घाटा मेंहदीपुर में आकर । प्रगटे प्रेतराज गुण सागर ॥
लाल ध्वजा उड़ रही गगन में । नाचत भक्त मगन हो मन में ॥
भक्त कामना पूरन स्वामी । बजरंगी के सेवक नामी ॥

इच्छा पूरन करने वाले । दु:ख संकट सब हरने वाले ॥
जो जिस इच्छा से आते हैं । वे सब मन वाँछित फल पाते हैं ॥
रोगी सेवा में जो आते । शीघ्र स्वस्थ होकर घर जाते ॥
भूत पिशाच जिन्न वैताला । भागे देखत रुप कराला ॥

भौतिक शारीरिक सब पीड़ा । मिटा शीघ्र करते हैं क्रीड़ा ॥
कठिन काज जग में हैं जेते । रटत नाम पूरन सब होते ॥
तन मन धन से सेवा करते । उनके सकल कष्ट प्रभु हरते ॥
हे करुणामय स्वामी मेरे । पड़ा हुआ हूँ चरणों में तेरे ॥

कोई तेरे सिवा न मेरा । मुझे एक आश्रय प्रभु तेरा ॥
लज्जा मेरी हाथ तिहारे । पड़ा हूँ चरण सहारे ॥
या विधि अरज करे तन मन से । छूटत रोग शोक सब तन से ॥
मेंहदीपुर अवतार लिया है । भक्तों का दु:ख दूर किया है ॥

रोगी, पागल सन्तति हीना । भूत व्याधि सुत अरु धन छीना ॥
जो जो तेरे द्वारे आते । मन वांछित फल पा घर जाते ॥
महिमा भूतल पर है छाई । भक्तों ने है लीला गाई ॥
महन्त गणेश पुरी तपधारी । पूजा करते तन मन वारी ॥

हाथों में ले मुगदर घोटे । दूत खड़े रहते हैं मोटे ॥
लाल देह सिन्दूर बदन में । काँपत थर-थर भूत भवन में ॥
जो कोई प्रेतराज चालीसा । पाठ करत नित एक अरु बीसा ॥
प्रातः काल स्नान करावै । तेल और सिन्दूर लगावै ॥

चन्दन इत्र फुलेल चढ़ावै । पुष्पन की माला पहनावै ॥
ले कपूर आरती उतारै । करै प्रार्थना जयति उचारै ॥
उनके सभी कष्ट कट जाते । हर्षित हो अपने घर जाते ॥
इच्छा पूरण करते जनकी । होती सफल कामना मन की ॥

भक्त कष्टहर अरिकुल घातक । ध्यान धरत छूटत सब पातक ॥
जय जय जय प्रेताधिप जय । जयति भुपति संकट हर जय ॥
जो नर पढ़त प्रेत चालीसा । रहत न कबहूँ दुख लवलेशा ॥
कह भक्त ध्यान धर मन में । प्रेतराज पावन चरणन में ॥

॥ दोहा ॥

दुष्ट दलन जग अघ हरन, समन सकल भव शूल ।
जयति भक्त रक्षक प्रबल, प्रेतराज सुख मूल ॥
विमल वेश अंजिन सुवन, प्रेतराज बल धाम ।
बसहु निरन्तर मम हृदय, कहत भक्त सुखराम ॥

॥ इति श्री प्रेतराज चालीसा संपूर्णम् ॥


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