श्री बजरंग बाण - चालीसा संग्रह

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Saturday, October 23, 2021

श्री बजरंग बाण

॥श्री बजरंग बाण॥

॥ दोहा ॥

निश्चय प्रेम प्रतीति ते।विनय करैं सनमान ।

तेहि के कारज सकल शुभ। सिद्ध करें हनुमान ॥

॥चौपाई॥

जय हनुमन्त संत हितकारी । सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ॥

जन के काज बिलम्ब न कीजै।आतुर दौरि महासुख दीजै ॥

जैसे कूदी सिन्धु महि पारा । सुरसा बदन पैठी विस्तारा ॥

आगे जाय लंकिनी रोका । मोरेहु लात गई सुर लोका ॥

जाय विभीषण को सुख दीन्हा । सीता निरखि परम-पद लीना ॥

बाग़ उजारि सिन्धु मह बोरा । अति आतुर जमकातर तोरा ॥

अक्षय कुमार मारि संहारा । लूम लपेटि लंक को जारा॥

लाह समान लंक जरि गई । जय-जय धुनि सुरपुर में भई ॥

अब बिलम्ब केहि कारन स्वामी । कृपा करहु उर अन्तर्यामी  ॥

जय जय लखन प्रान के दाता । आतुर होई  दु:ख करहु निपाता ॥

जै गिरिधर जै जै सुख सागर । सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥

ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले । बैरिहि मारु बज्र की कीले॥

गदा बज्र लै बैरिहि मारो । महाराज प्रभु दास उबारो ॥

ॐकार हुंकार महा प्रभु धाओ । बज्र गदा हनु विलम्ब न लाओ ॥

ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा । ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर-सीसा॥

सत्य होहु हरी शपथ पायके । राम दूत धरु मारू जायके॥

जय जय जय हनुमन्त अगाधा । दुःख पावत जन केहि अपराधा ॥

पूजा जप-तप नेम अचारा । नहिं जानत हो दास तुम्हारा ॥

वन उपवन मग गिरि गृह मांहीं । तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं ॥

पायं परौं कर जोरी मनावौं । येहि अवसर अब केहि गोहरावौं ॥

जय अन्जनी कुमार बलवंता । शंकर सुवन वीर हनुमंता ॥

बदन कराल काल कुलघालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक ॥

भूत  प्रेत   पिसाच  निसाचर। अगिन वैताल काल मारी मर ॥

इन्हें मारु, तोहि शपथ राम की । राखउ नाथ मरजाद नाम की ॥

जनकसुता हरि दास कहावो । ताकी शपथ विलम्ब  न लावो ॥

जै जै जै धुनि होत अकासा । सुमिरत होत  दुसह दुःख  नासा ॥

चरण शरण  कर जोरि मनावौं । यहि अवसर अब केहि गोहरावौं ॥

उठु  उठु चलु तोहि राम-दोहाई । पायँ परौं, कर जोरि मनाई ॥

ॐ चं चं चं चं चपल चलंता । ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता ॥

ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल । ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल ॥

अपने जन को तुरत उबारौ । सुमिरत होय आनंद हमारौ॥

यह बजरंग बाण जेहि मारै।ताहि कहो फिर कोन  उबारै ॥

पाठ करै बजरंग  बाण की । हनुमत रक्षा करैं  प्रान की ॥

यह बजरंग बाण जो जापैं । ताते  भूत-प्रेत सब कापैं ॥

धूप देय  अरु  जपै हमेशा । ताके तन नहिं रहै कलेसा ॥

॥दोहा॥

प्रेम प्रतीतिहि  कपि भजै।  सदा धरै उर ध्यान ॥

तेहि के कारज सकल सुभ।  सिद्ध करैं हनुमान ॥

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